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गुज़ारे का पैसा
हर महीने गुज़ारे का पैसा माँगना आपका कानूनी हक़ है।
सुनिए गुज़ारे का पैसा
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कानूनी आधार
- जो पत्नी अपना ख़र्च नहीं उठा सकती, या अगर उसकी तनख़्वाह पति की तनख़्वाह से कम है, वह पति से हर महीने गुज़ारा भत्ता माँग सकती है — दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५, अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, २०२३ की धारा १४४ (वकील पक्का करेंगे)। बच्चे और निर्भर माँ-बाप भी माँग सकते हैं। अलग रह रही औरत बिना तलाक़ के भी माँग सकती है; तलाक़शुदा भी, जब तक दूसरी शादी न की हो।
- सर्वोच्च न्यायालय (रजनेश बनाम नेहा, २०२०): दोनों पक्ष अपनी कमाई और संपत्ति का हलफ़नामा देंगे; भत्ता आवेदन की तारीख़ से मिलता है; अंतरिम (बीच का) भत्ता पहले तय होता है; अलग-अलग क़ानूनों के दावे दोहरा कर नहीं गिने जाएँगे।
- मुस्लिम महिला भी अपने पति से इसी धारा १४४ के तहत गुज़ारा भत्ता माँग सकती है — सर्वोच्च न्यायालय (मोहम्मद अब्दुल समद, २०२४) ने साफ़ कहा कि तलाक़शुदा मुस्लिम महिला पर भी यह धारा लागू होती है, और यह हक़ पर्सनल लॉ के अलावा है, उसके बदले में नहीं।
- DLSA से दायर करना मुफ़्त है; यह मामला सरल और संक्षिप्त होता है। घरेलू हिंसा क़ानून की धारा २० का पैसे का आदेश इसके अलावा भी मिल सकता है (एक ही रक़म दो बार नहीं गिनी जाएगी)।
एक कदम आज
महीने के खर्चे का हिसाब लिखना आज से शुरू करें।
कहाँ जाएँ
- DLSA (ज़िला अदालत) — मुफ़्त वकील, मुफ़्त आवेदन • १५१६ • ऑनलाइन: scourtapp.nic.in/lsams।
- परिवार न्यायालय / मजिस्ट्रेट की अदालत (धारा १४४); आदेश के बाद भी पैसे न मिलें तो वसूली भी उसी अदालत से होती है।
- लोक अदालत (DLSA से) — सहमति वाले समझौते; अवॉर्ड अदालत के फ़ैसले जितना ही पक्का होता है।
- संस्थाओं की मदद: मजलिस (मुंबई) • आली (लखनऊ) • सेवा (अहमदाबाद, असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए)।
DLSA (मुफ़्त फ़ाइलिंग) · फ़ैमिली कोर्ट / मजिस्ट्रेट · लोक अदालत
किससे मिलें: DLSA फ़्रंट ऑफ़िस; लीगल एड काउंसल
असली ज़िंदगी में
- 'तलाक़ नहीं हुआ तो भत्ता नहीं मिलता' — ग़लत; अलग रह रही औरत बिना तलाक़ के दावा कर सकती है।
- 'वह कमा लेती है, तो कुछ नहीं बनता' — कमाई से दावा ख़त्म नहीं होता; सवाल यह है कि क्या आप अपने पति जितना या उससे ज़्यादा कमाती हैं। अगर नहीं, तो आप गुज़ारा भत्ता माँग सकती हैं।
- 'उसकी कोई कमाई नहीं' — जबकि धंधा या खेती रिश्तेदार के नाम पर चल रही हो; अदालत इसके आर-पार देख सकती है — जो पता हो, नोट करें।
- दबाव में, बिना मुफ़्त सलाह के, एकमुश्त 'पूर्ण और अंतिम' समझौते पर हस्ताक्षर कर देना।
- बच्चों की फ़ीस और दवाई को सिर्फ़ माँ की ज़िम्मेदारी मान लेना — बच्चों का दावा अलग से बनता है।
- सालों इंतज़ार करना — बकाया आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से जुड़ता है, इसलिए देरी सीधा पैसे का नुक़सान है।
सँभाल कर रखें
- शादी का सबूत, बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र, और पति की कमाई / नौकरी / संपत्ति की जो भी जानकारी हो, सँभाल कर रखें।
- DLSA से मुफ़्त आवेदन लगाएँ और पहले ही चरण में अंतरिम भत्ता ज़रूर माँगें।
- महीने के ख़र्च का सरल हिसाब रखें (किराया, खाना, स्कूल, दवाई) — इसी से रक़म तय होती है।
- मुक़दमे के नंबर से eCourts पोर्टल या ऐप पर ख़ुद अपना मामला देखती रहें।
सेव करने से पहले सोच लें। फ़ोन किसी और के पास तो नहीं?