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पैसे रोकना भी ग़लत है

कमाई छीनना या ख़र्चा रोकना ग़लत है।

सुनिए पैसे रोकना भी ग़लत है

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कानूनी आधार

  • जो पत्नी अपना ख़र्च ख़ुद नहीं उठा सकती, वह पति से हर महीने गुज़ारा भत्ता माँग सकती है — पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १२५, अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, २०२३ की धारा १४४। यह धारा हर धर्म की महिला पर लागू है; अलग रह रही पत्नी बिना तलाक़ के भी माँग सकती है। आवेदन सरल होता है, DLSA से मुफ़्त दायर होता है, और रक़म आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से जुड़ती है।
  • नाबालिग बेटी अपने पिता से गुज़ारा भत्ता माँग सकती है — इसी धारा १४४ में नाबालिग बच्चों का अपना अलग हक़ है (माँ उनकी तरफ़ से आवेदन दे सकती है), और हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, १९५६ की धारा २० में पिता पर अपनी बेटी का ख़र्च उठाने की ज़िम्मेदारी है — जब तक वह ख़ुद कमा न सके।
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, २००५ की धारा ३ मानती है कि पैसे या ज़रूरी चीज़ों से वंचित रखना (घर-ख़र्च, दवाई, बच्चों की पढ़ाई), आपकी चीज़ें या स्त्रीधन बेच देना, कमाई छीन लेना, काम करने से रोकना, या घर की साझा चीज़ों के इस्तेमाल से रोकना — यह सब 'आर्थिक हिंसा' है। इसी क़ानून से आपको मिल सकता है: संरक्षण आदेश (धारा १८), घर में रहने का आदेश (धारा १९), पैसे का आदेश यानी ख़र्च और गुज़ारा (धारा २०), मुआवज़ा (धारा २२)। धारा १२ का आवेदन मुफ़्त है, शुरू करने के लिए वकील ज़रूरी नहीं, और अदालत को ६० दिन में निपटाने की कोशिश करनी होती है।
  • आपकी कमाई सिर्फ़ आपकी है। बराबर काम का बराबर दाम अब क़ानून है (वेतन संहिता, २०१९)।

एक कदम आज

आज से एक छोटी डायरी रखें, कब, क्या, कितना।

कहाँ जाएँ

  • नज़दीकी पुलिस थाने का मध्यस्थता केंद्र / महिला सहायता केंद्र — कई ज़िलों में थाने के अंदर ही पारिवारिक झगड़ों के लिए परामर्श और समझौते का केंद्र होता है, जहाँ बिना मुक़दमा दायर किए बात रखी जा सकती है • महिला हेल्पलाइन १८१ • तुरंत ख़तरा हो तो ११२।
  • हर ज़िले में सखी केंद्र (वन स्टॉप सेंटर) — डॉक्टरी जाँच, पुलिस, क़ानूनी मदद, परामर्श और कुछ दिन रुकने की जगह, सब एक ही छत के नीचे (missionshakti.wcd.gov.in)।
  • DLSA मुफ़्त वकील • १५१६ • ऑनलाइन: scourtapp.nic.in/lsams।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग: ncwapps.nic.in/onlinecomplaintsv2 • १४४९०।
  • संस्थाओं की मदद: शक्ति शालिनी ०११-२४३७३७३७ / व्हाट्सएप ७८३८९५७८१० (२४x७) • जागोरी ८८००-९९६६४० • स्नेहा (मुंबई) snehamumbai.org • स्वयम् (कोलकाता)।
असली ज़िंदगी में
  • 'वह मेरी पूरी तनख़्वाह ले लेता है' — कमाई ले लेना पति का हक़ नहीं; क़ानून इसे घरेलू हिंसा कहता है।
  • खाने, दवाई, बच्चों की पढ़ाई के पैसे 'सज़ा' के तौर पर रोकना।
  • 'वह ख़ुद तो कमाती है, उसे पैसे क्यों दूँ' — आप कमाती हैं या नहीं, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता; घर-ख़र्च, खाने, दवाई और बच्चों की बुनियादी ज़रूरतों के पैसे न देना भी आर्थिक हिंसा ही है।
  • नौकरी करने से रोकना, या चल रही नौकरी छुड़वा देना।
  • ATM कार्ड, पासबुक, या UPI वाला फ़ोन (Paytm, PhonePe, Google Pay) ज़ब्त कर लेना; आपका खाता 'आपके लिए' ख़ुद चलाना।
  • घर का सामान या आपकी चीज़ें बिना पूछे बेच देना।
  • 'घर का पैसा घरवाले सँभालते हैं, औरत को क्या लेना' — जिस पैसे पर आप निर्भर हैं, उसकी जानकारी से जान-बूझ कर दूर रखना भी इसी पैटर्न का हिस्सा है।
  • आपके नाम पर आई सरकारी योजना की रक़म (सीधे खाते में आने वाला पैसा) कोई और ले ले।
सँभाल कर रखें
  • चुपचाप तारीख़ वाला नोट रखें — कब, क्या, कितना (अपनी निजी डायरी या अपने ईमेल के ड्राफ़्ट में); तनख़्वाह की पर्ची और संदेश सँभालें।
  • तनख़्वाह और सरकारी पैसा ऐसे खाते में आए जिसे सिर्फ़ आप चलाती हैं (कार्ड ६ देखें); PIN और OTP परिवार में भी गुप्त।
  • घर के बाहर किसी भरोसे वाले के पास छोटी-सी आपात बचत रखें।
  • एक भरोसे वाले इंसान को उसी समय बता दें — वही आगे चल कर गवाह बन जाता है।

सेव करने से पहले सोच लें। फ़ोन किसी और के पास तो नहीं?

यह भी जानिए

यह जानकारी है, सलाह नहीं वकील ने जाँचा है जाँचा गया: १३ अगस्त २०२६